स्वामी विवेकानंद की संपूर्ण जीवनी पढ़ें। जानिए उनके जन्म, बचपन, शिक्षा, रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात, आध्यात्मिक यात्रा, संन्यास और भारत के महान विचारक बनने की प्रेरणादायक कहानी।
INTRODUCTION
भारत के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिनकी सोच समय और सीमाओं से परे जाकर पूरी मानवता को प्रेरित करती है। स्वामी विवेकानंद ऐसे ही महान संत, दार्शनिक और राष्ट्रचिंतक थे। उन्होंने केवल धार्मिक उपदेश नहीं दिए, बल्कि युवाओं में आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण, शिक्षा, सेवा और राष्ट्रप्रेम की भावना जगाई।
उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा पीढ़ी होती है। वे कहते थे कि यदि युवाओं में आत्मविश्वास, अनुशासन और सेवा का भाव हो, तो कोई भी देश विश्व में अग्रणी बन सकता है। यही कारण है कि आज भी उनके विचार शिक्षा, नेतृत्व, व्यक्तित्व विकास और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे।

जन्म और परिवार
स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक शिक्षित और सांस्कृतिक परिवार में हुआ। उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था।
उनके पिता विश्वनाथ दत्त एक प्रसिद्ध वकील थे। वे आधुनिक विचारों वाले, तार्किक और उदार व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक, आध्यात्मिक और अत्यंत संस्कारी थीं। उन्होंने बचपन से ही नरेंद्रनाथ को सत्य, साहस, करुणा और आत्मसंयम जैसे मूल्य सिखाए।
नरेंद्रनाथ के व्यक्तित्व में पिता की तार्किक सोच और माता की आध्यात्मिकता का सुंदर संतुलन दिखाई देता है।
बचपन
बचपन से ही नरेंद्रनाथ अत्यंत जिज्ञासु, निडर और ऊर्जावान थे। उन्हें केवल पढ़ाई में ही नहीं, बल्कि संगीत, व्यायाम, तैराकी, घुड़सवारी और ध्यान में भी रुचि थी।
वे किसी भी बात को बिना तर्क और अनुभव के स्वीकार नहीं करते थे। यदि कोई धार्मिक या दार्शनिक बात कही जाती, तो वे उसका कारण और प्रमाण जानना चाहते थे। यही प्रश्न पूछने की आदत आगे चलकर उनके आध्यात्मिक जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनी।
शिक्षा
नरेंद्रनाथ ने प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता में प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने दर्शन, इतिहास, साहित्य, संगीत और पश्चिमी दर्शन का गंभीर अध्ययन किया।
कॉलेज के दौरान उन्होंने भारतीय उपनिषदों, वेदांत और साथ ही यूरोपीय दार्शनिकों के विचारों का भी अध्ययन किया। वे मानते थे कि ज्ञान किसी एक परंपरा तक सीमित नहीं होता, बल्कि सत्य की खोज के लिए खुले मन से अध्ययन आवश्यक है।
व्यक्तित्व और रुचियाँ
नरेंद्रनाथ केवल एक मेधावी विद्यार्थी नहीं थे, बल्कि प्रभावशाली वक्ता और कुशल गायक भी थे। उन्हें शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी।
उनका व्यक्तित्व आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और अनुशासन से भरा हुआ था। मित्रों के बीच वे अपनी स्पष्ट सोच और प्रभावशाली संवाद शैली के लिए जाने जाते थे।
आध्यात्मिक खोज
यद्यपि नरेंद्रनाथ आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, फिर भी उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था—
“क्या वास्तव में ईश्वर का अनुभव किया जा सकता है?”
वे अनेक विद्वानों, धार्मिक नेताओं और संतों से मिले, लेकिन उन्हें ऐसा उत्तर नहीं मिला जो उनके मन को पूरी तरह संतुष्ट कर सके।
उनकी खोज केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं थी; वे प्रत्यक्ष अनुभव और सत्य की तलाश में थे।
रामकृष्ण परमहंस से पहली मुलाकात
इसी खोज के दौरान उनकी मुलाकात दक्षिणेश्वर काली मंदिर के संत रामकृष्ण परमहंस से हुई।
नरेंद्रनाथ ने उनसे सीधा प्रश्न पूछा—
“क्या आपने ईश्वर को देखा है?”
रामकृष्ण परमहंस ने बिना किसी संकोच के उत्तर दिया कि उन्होंने ईश्वर का अनुभव किया है और मनुष्य भी साधना के माध्यम से उसका अनुभव कर सकता है।
यह उत्तर नरेंद्रनाथ के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
गुरु-शिष्य संबंध
प्रारंभ में नरेंद्रनाथ ने रामकृष्ण परमहंस की बातों को तर्क की कसौटी पर परखा। वे किसी भी बात को अंधविश्वास के आधार पर स्वीकार नहीं करते थे।
समय के साथ उन्होंने अनुभव किया कि उनके गुरु केवल उपदेश देने वाले संत नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक अनुभव वाले व्यक्ति हैं।
धीरे-धीरे उनका संबंध केवल शिक्षक और विद्यार्थी का नहीं रहा, बल्कि गुरु और शिष्य का बन गया।
आध्यात्मिक परिवर्तन
रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में नरेंद्रनाथ का जीवन धीरे-धीरे बदलने लगा।
उन्होंने महसूस किया कि आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि मानवता की सेवा, आत्मविकास और सत्य की खोज है।
यही विचार आगे चलकर उनके पूरे जीवन और संदेश का आधार बने।
संन्यास की शुरुआत
1886 में रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के बाद उनके प्रमुख शिष्यों ने संन्यासी जीवन अपनाया।
इसी दौरान नरेंद्रनाथ ने संन्यास ग्रहण किया और आगे चलकर “स्वामी विवेकानंद” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
उन्होंने व्यक्तिगत मुक्ति से अधिक मानव सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। उनका विश्वास था कि “मानव सेवा ही ईश्वर की सेवा है।”
स्वामी विवेकानंद की जीवनी: भारत भ्रमण से विश्व मंच तक, शिकागो भाषण, रामकृष्ण मिशन और अमर विरासत
भारत भ्रमण: भारत को समझने की यात्रा
संन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी विवेकानंद ने पूरे भारत का व्यापक भ्रमण किया। यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं थी, बल्कि भारत की वास्तविक परिस्थितियों को समझने का प्रयास भी थी।
उन्होंने हिमालय से लेकर दक्षिण भारत तक अनेक नगरों, गाँवों और तीर्थस्थलों का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने समाज के हर वर्ग के लोगों से मुलाकात की। उन्होंने गरीबी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव को बहुत करीब से देखा।
यहीं से उनके मन में यह विचार और मजबूत हुआ कि केवल आध्यात्मिक उपदेश पर्याप्त नहीं हैं। भारत को शिक्षा, आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण और समाज सेवा की भी उतनी ही आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भूखे व्यक्ति के लिए पहले भोजन आवश्यक है, उसके बाद आध्यात्मिक ज्ञान। यही सोच आगे चलकर उनके सामाजिक कार्यों की आधारशिला बनी।
कन्याकुमारी में ध्यान और भारत का विज़न
भारत भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद दक्षिण भारत के अंतिम छोर कन्याकुमारी पहुँचे। परंपरागत विवरण के अनुसार वे समुद्र में स्थित एक चट्टान तक तैरकर गए और वहाँ गहन ध्यान किया।
इसी ध्यान के दौरान उन्होंने भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर गंभीर चिंतन किया। उन्होंने महसूस किया कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और युवा शक्ति है।
उन्होंने निश्चय किया कि वे भारत की आध्यात्मिक परंपरा को विश्व तक पहुँचाएँगे और साथ ही भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाने का प्रयास करेंगे।
1893 का शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन
1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म सम्मेलन (Parliament of the World’s Religions) आयोजित हुआ।
स्वामी विवेकानंद ने वहाँ भारत और वेदांत का प्रतिनिधित्व किया।
11 सितंबर 1893 को उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत इन शब्दों से की—
“Sisters and Brothers of America…”
कहा जाता है कि इन शब्दों के बाद उपस्थित श्रोताओं ने लंबे समय तक तालियाँ बजाईं। उनका संदेश केवल किसी एक धर्म का प्रचार नहीं था, बल्कि सभी धर्मों के प्रति सम्मान, सहिष्णुता और मानव एकता का था।
इस भाषण ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और भारतीय दर्शन को वैश्विक मंच पर नई प्रतिष्ठा मिली।
अमेरिका और यूरोप में वेदांत का प्रचार
शिकागो सम्मेलन के बाद स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका और यूरोप के अनेक शहरों में व्याख्यान दिए।
उन्होंने वेदांत, योग, आत्मविश्वास, मानव सेवा और आध्यात्मिक जीवन पर सरल तथा तार्किक शैली में विचार रखे। उनके व्याख्यानों में केवल धार्मिक लोग ही नहीं, बल्कि शिक्षाविद, वैज्ञानिक, लेखक और सामान्य नागरिक भी शामिल होते थे।
उन्होंने पश्चिमी समाज को भारतीय दर्शन का ऐसा परिचय कराया, जो तर्क, अनुभव और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों पर आधारित था।
रामकृष्ण मिशन की स्थापना
भारत लौटने के बाद 1897 में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
इस संस्था का उद्देश्य केवल धार्मिक कार्य करना नहीं था, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत कार्य, ग्रामीण विकास और मानव सेवा के माध्यम से समाज का उत्थान करना था।
स्वामी विवेकानंद का मानना था कि यदि धर्म मानव सेवा से जुड़ा नहीं है, तो उसका उद्देश्य अधूरा है।
आज भी रामकृष्ण मिशन भारत और अनेक देशों में शिक्षा, चिकित्सा, आपदा राहत और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में सक्रिय है।
युवाओं के लिए उनका संदेश
स्वामी विवेकानंद का सबसे अधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ा।
वे कहते थे कि राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के हाथ में होता है। उनका विश्वास था कि आत्मविश्वास, अनुशासन, शिक्षा और चरित्र निर्माण किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी हैं।
उनके अनेक विचार आज भी व्यापक रूप से उद्धृत किए जाते हैं, जैसे—
- “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक मत रुको।”
- “एक विचार को अपना जीवन बना लो।”
- “शक्ति ही जीवन है, निर्बलता मृत्यु है।”
इन संदेशों का मूल उद्देश्य युवाओं को आत्मविश्वासी, कर्मठ और समाज के प्रति जिम्मेदार बनाना था।
शिक्षा पर विचार
स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा केवल जानकारी एकत्र करना नहीं है।
वे कहते थे कि वास्तविक शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर छिपी क्षमता, चरित्र, आत्मविश्वास और नैतिकता का विकास करे।
उनका मानना था कि यदि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने तक सीमित रह जाए, तो वह समाज का समग्र विकास नहीं कर सकती।
राष्ट्रवाद और मानवता

स्वामी विवेकानंद भारत की सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते थे, लेकिन उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था।
वे सभी धर्मों और संस्कृतियों के सम्मान में विश्वास रखते थे।
उनका संदेश था कि भारत अपनी आध्यात्मिक शक्ति के साथ-साथ विज्ञान, शिक्षा और सामाजिक सुधार में भी आगे बढ़े।
उन्होंने मानवता को किसी जाति, भाषा या धर्म से ऊपर माना।
प्रमुख पुस्तकें और व्याख्यान
स्वामी विवेकानंद ने अनेक व्याख्यान दिए और उनके भाषणों एवं पत्रों का बाद में संकलन प्रकाशित हुआ।
उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं—
- Raja Yoga
- Jnana Yoga
- Karma Yoga
- Bhakti Yoga
- Lectures from Colombo to Almora
- Inspired Talks
इन रचनाओं में योग, वेदांत, आध्यात्मिकता, सेवा और आत्मविकास पर उनके विचार विस्तार से मिलते हैं।
अंतिम दिन और महासमाधि
4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में स्वामी विवेकानंद ने अपने दैनिक कार्य पूरे किए, ध्यान किया और उसी दिन उनका देहावसान हुआ।
वे केवल 39 वर्ष की आयु तक जीवित रहे, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने जो कार्य किए, उनका प्रभाव आज भी विश्वभर में महसूस किया जाता है।
स्वामी विवेकानंद की विरासत
स्वामी विवेकानंद की विरासत केवल एक संन्यासी की नहीं, बल्कि एक ऐसे विचारक की है जिसने भारत के आत्मविश्वास को नई ऊर्जा दी।
उन्होंने भारतीय दर्शन को वैश्विक मंच तक पहुँचाया, युवाओं को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी और सेवा को आध्यात्मिक जीवन का अभिन्न अंग बताया।
आज भी उनके विचार शिक्षा, नेतृत्व, व्यक्तित्व विकास, राष्ट्र निर्माण और आध्यात्मिक जीवन में व्यापक रूप से प्रेरणा देते हैं।
कम ज्ञात तथ्य
- वे शास्त्रीय संगीत के अच्छे गायक थे।
- उन्हें शारीरिक व्यायाम और तैराकी का विशेष शौक था।
- उनकी स्मरण शक्ति अत्यंत विलक्षण मानी जाती थी।
- वे भारतीय और पाश्चात्य दोनों दर्शन का गहरा अध्ययन करते थे।
- उनका जन्मदिन (12 जनवरी) भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्रमुख उपलब्धियाँ
- भारतीय वेदांत और योग को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
- 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में भारत का प्रभावशाली प्रतिनिधित्व किया।
- रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
- शिक्षा, सेवा और चरित्र निर्माण पर आधारित सामाजिक दृष्टिकोण दिया।
- लाखों युवाओं को आत्मविश्वास और राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित किया।
1. स्वामी विवेकानंद कौन थे?
उत्तर: स्वामी विवेकानंद भारत के महान संन्यासी, दार्शनिक, समाज सुधारक और युवाओं के प्रेरणास्रोत थे। उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उन्होंने भारतीय वेदांत और योग दर्शन को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।
2. स्वामी विवेकानंद का मूल नाम क्या था?
उत्तर: स्वामी विवेकानंद का मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था।
3. स्वामी विवेकानंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता), पश्चिम बंगाल में हुआ था।
4. स्वामी विवेकानंद के माता-पिता कौन थे?
उत्तर: उनके पिता विश्वनाथ दत्त एक वकील थे और उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक एवं संस्कारी व्यक्तित्व की थीं।
5. स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे?
उत्तर: उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस थे, जिनसे उन्होंने आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की और जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
6. स्वामी विवेकानंद ने संन्यास कब लिया?
उत्तर: 1886 में रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के बाद उन्होंने संन्यासी जीवन अपनाया और “स्वामी विवेकानंद” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
7. स्वामी विवेकानंद शिकागो क्यों गए थे?
उत्तर: वे 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत और वेदांत दर्शन का प्रतिनिधित्व करने गए थे।
8. स्वामी विवेकानंद का प्रसिद्ध शिकागो भाषण कब हुआ?
उत्तर: उनका ऐतिहासिक भाषण 11 सितंबर 1893 को विश्व धर्म सम्मेलन में हुआ।
9. “Sisters and Brothers of America” क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर: यह स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की शुरुआती पंक्ति थी। इस आत्मीय संबोधन ने श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया और उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
10. स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब की?
उत्तर: उन्होंने 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
11. रामकृष्ण मिशन का उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत कार्य, ग्रामीण विकास, आध्यात्मिक जागरूकता और मानव सेवा के माध्यम से समाज का उत्थान करना है।
12. स्वामी विवेकानंद का सबसे प्रसिद्ध संदेश क्या है?
उत्तर: उनका प्रसिद्ध संदेश है—“उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक मत रुको।”
13. स्वामी विवेकानंद युवाओं को क्या संदेश देते थे?
उत्तर: वे युवाओं को आत्मविश्वासी बनने, चरित्र निर्माण करने, अनुशासन अपनाने, शिक्षा प्राप्त करने और राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा देते थे।
14. स्वामी विवेकानंद की प्रमुख पुस्तकें कौन-सी हैं?
उत्तर: उनकी प्रमुख कृतियों में Raja Yoga, Jnana Yoga, Karma Yoga, Bhakti Yoga, Lectures from Colombo to Almora और Inspired Talks शामिल हैं।
15. स्वामी विवेकानंद का शिक्षा पर क्या दृष्टिकोण था?
उत्तर: उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर छिपी शक्ति, आत्मविश्वास, चरित्र और नैतिकता का विकास करना है।
16. स्वामी विवेकानंद ने भारत भ्रमण क्यों किया?
उत्तर: उन्होंने भारत की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति को समझने तथा लोगों की वास्तविक समस्याओं को जानने के लिए व्यापक भारत भ्रमण किया।
17. कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद का ध्यान क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
उत्तर: परंपरागत विवरण के अनुसार कन्याकुमारी में ध्यान के दौरान उन्होंने भारत के पुनर्जागरण और समाज सेवा के अपने व्यापक मिशन को स्पष्ट रूप दिया।
18. स्वामी विवेकानंद का महासमाधि कब हुई?
उत्तर: उनका देहावसान 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ, पश्चिम बंगाल में हुआ।
19. स्वामी विवेकानंद की आयु कितनी थी?
उत्तर: उनके निधन के समय उनकी आयु 39 वर्ष थी।
20. भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस कब मनाया जाता है?
उत्तर: हर वर्ष 12 जनवरी, स्वामी विवेकानंद की जयंती पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है।
21. स्वामी विवेकानंद का मुख्य दर्शन क्या था?
उत्तर: उनका दर्शन अद्वैत वेदांत, मानव सेवा, आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण, धार्मिक सहिष्णुता और सार्वभौमिक मानवता पर आधारित था।
22. स्वामी विवेकानंद की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानी जाती है?
उत्तर: भारतीय वेदांत और योग को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाना तथा भारत की आध्यात्मिक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिलाना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में माना जाता है।
23. स्वामी विवेकानंद आज भी क्यों प्रासंगिक हैं?
उत्तर: उनके विचार आत्मविश्वास, नेतृत्व, शिक्षा, चरित्र निर्माण, सेवा और राष्ट्र निर्माण पर आधारित हैं, जो आज भी व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के लिए प्रेरणादायक माने जाते हैं।
24. स्वामी विवेकानंद का भारत के युवाओं पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर: उन्होंने युवाओं में आत्मविश्वास, राष्ट्रप्रेम, अनुशासन और सेवा की भावना जगाई। आज भी उनके विचार अनेक युवा कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और नेतृत्व प्रशिक्षण में प्रेरणा का स्रोत हैं।
25. स्वामी विवेकानंद की सबसे बड़ी विरासत क्या है?
उत्तर: उनकी सबसे बड़ी विरासत यह संदेश है कि मानव सेवा ही ईश्वर की सेवा है। उन्होंने भारतीय आध्यात्मिकता को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया और आत्मविश्वास, शिक्षा, नैतिकता तथा सेवा को राष्ट्र निर्माण का आधार बताया।
CONCLUSION
स्वामी विवेकानंद का जीवन यह सिखाता है कि महानता केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि उस ज्ञान को मानवता की सेवा में लगाने से प्राप्त होती है।
उन्होंने भारत की आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया और यह संदेश दिया कि मजबूत चरित्र, निस्वार्थ सेवा, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास से व्यक्ति और राष्ट्र—दोनों का उत्थान संभव है।
उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी एक शताब्दी पहले थीं। यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद केवल भारत के नहीं, बल्कि विश्व के महानतम प्रेरणास्रोतों में से एक माने जाते हैं।